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बहुत ही खास “रमज़ान के मायने” – मुहम्मद ज़ाहिद भाई की कलम से – देखें और अपने भाइयों तक शेयर करें



रमज़ान के क्या मायने हैं ? रमज़ान के महीने में पड़ने वाले 29 या 30 रोज़े के मायने क्या केवल इंसान को भूखा और प्यासा रखना है ? दरअसल यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्युँकि कुछ नास्तिक और खासकर उर्दू नाम वाले छद्म नास्तिक “रमज़ान” के महीने में 45° तापमान पर इंसान को 15 घंटे 30 दिन भूखे प्यासे रहने को इंसानों पर अल्लाह का अत्याचार बता रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि वह खुद रोज़े नहीं रखते होंगे और अपने इस धार्मिक दायित्व को पूरा ना करने की मानसिक कुंठा को संतुष्ट करने के लिए यह ऐसे ऊल जुलूल तर्क और भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।

खैर… आईए समझते हैं कि “रमज़ान के मायने” क्या हैं और रोज़ा दरअसल है क्या ?

क्या केवल भूखा प्यासा रहना ही रोज़ा है ? नहीं, दरअसल केवल भूखा और प्यासा रहना “फाक़ा” अर्थात “व्यर्थ उपवास” करना मात्र है इससे अधिक कुछ नहीं। रोज़ा एक संपुर्णता को समेटे हुए शब्द है जिसको सभी को समझना बेहद आवश्यक है। क़ुरआन कहता है कि दुनिया इंसान के लिए एक परीक्षा स्थल है। इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य ईश्वर की इबादत (उपासना) है। (क़ुरआन, 51:56)
इबादत का अर्थ क्या है?
ईश्वर केन्द्रित जीवन (God-centred life) व्यतीत करना है, इबादत एक पार्ट-टाइम नहीं, बल्कि फुल टाइम अमल है, जो पैदाइश से लेकर मौत तक जारी रहता है। यह अनिवार्य अर्थात रोज़े फर्ज़ हैं, जो केवल रमज़ान के महीने में रखे जाते हैं और यह हर व्यस्क मुसलमान के लिए अनिवार्य हैं।
क़ुरआन में कहा गया है:‘‘ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे, शायद कि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ।’’ – (क़ुरआन, 2:183) रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथ। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो, उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या यात्रा में हो तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी कर ले। ईश्वर तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर ईश्वर की बड़ाई प्रकट करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो।’’ – (क़ुरआन, 2:185)
अब समझिए कि “रोज़ा” क्या है? रोज़ा भी एक इबादत है । रोज़े को अरबी भाषा में ‘‘सौम’’ कहते हैं। इसका अर्थ ‘‘रुकने और चुप रहने’’ हैं। क़ुरआन में इसे ‘‘सब्र’’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘स्वयं पर नियंत्रण’ और स्थिरता व जमाव (Stability)।
इसका ख़ुलासा ज़ब्ते नफ़स, साबित क़दमी और इख़्लास है।
• ज़ब्ते नफस :– अर्थात शरीर की समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण करना।
• साबित क़दमी :- अर्थात अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना।
• इख़्लास :- अर्थात ईमानदारी और निष्ठा
“ज़ब्ते नफस” सबसे महत्वपूर्ण है।
शरीर की समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण “रोज़े” का एक महत्वपूर्ण अंश है।
इंद्रियाँ कैसे नियंत्रित होंगी ? जैसे रोज़ा रहने वाले के मन में कोई भी गलत, अनैतिक, छद्म, झूठ, मक्कारी, चुगली, लड़ाई लड़ाना, दूषित अथवा किसी को भी बिना किसी उचित कारण के आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक चोट पहुँचाने का ध्यान भी आया तो उसे तुरंत मन से ही निकाल देना या ऐसे विचार आने ही ना देना दरअसल “रोज़ा” है।
किसी महिला के प्रति गलत भाव आया या उसे देख कर या सोचकर मन और शरीर में उत्तेजना या बुरे ख्याल आए उसे तुरंत रोक देना ही नहीं बल्कि किसी भी महिला को इस नजर से देखने से खुद को रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है।
चोरी, डकैती, धोखा देना या किसी को बेवजह कष्ट पहुँचाना और कष्ट पहुँचाने का सोचने को खुद को रोक देना या ऐसे ही वह तमाम बुरे काम जो मनमस्तिष्क में आते हैं उनको आने से रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है। सोचिएगा कि इन कामों को करना फिर कितना बुरा होगा कितना बड़ा प्रतिबंध होगा जबकि इनके सोचने पर ही रोज़े में प्रतिबंध है। रोज़ा दरअसल पेट और मुँह के साथ साथ कान, आँख, और वाणी के साथ साथ हृदय और मन में भी गलत बात ना आए उसका एक प्रयास है तो अपनी शारीरिक इच्छाओं को नियंत्रित करना भी रोज़ा है। जिसका जितना अधिक प्रयास सफल होगा रोज़ा उतना अधिक सफल होगा।

“साबित क़दम” से तात्पर्य यह है कि इस्लाम और कुरान के बताए सभी आदर्शों पर अडिग होकर अमल करना, और यह करना ही दरअसल “रोज़ा” है। “इख़्लास” अर्थात ईमानदारी और निष्ठा जो कि इस्लाम का मूलभूत सिद्धांत है , इसपर अडिग होकर अमल करना ही दरअसल रोज़ा है। बात समझिए कि सिर्फ़ भूखा प्यासा रहना ही रोज़ा नहीं है। रोज़ा की संपुर्णता में उपरोक्त तीनों का ईमानदारी और निष्ठा से अमल करना आवश्यक है, रोज़े की संपुर्णता तभी होगी। इस से ज़ाहिर होता है कि इस्लाम धर्म के समीप “रोज़ा” का मतलब यह है कि आदमी अपनी इंद्रियों के हवा व हवस और नाजायज़ इच्छाओं में बहक कर ग़लत राह पर ना पड़े और अपने अन्दर मौजूद ज़ब्त और साबित क़दमी के तेवर को बर्बाद होने से बचाऐ।
दिन प्रतिदिन के जो कार्य होते हैं उनमें तीन विषय ऐसे होते हैं, जो इन्सान की पाक आदतों को बर्बाद कर के उसे “हवा व हवस” का पुजारी बना देती है। अर्थात खाना, पीना और औरत मर्द (पति-पत्नी) के बीच शारीरिक सम्बंध। इन्हीं को काबू में रखने और एक तय समय में उन से दूर रहने का दरअसल नाम भी “रोज़ा” है। इस्लाम में मुसलमान का अल्लाह की इबादत की नीयत से सुर्योदय से लेकर सुर्यास्त तक अपने आप को जानबूझकर खाने, पीने और पत्नी-पत्नी का शारीरिक संबंध से खुद को बचाए रखने का दरअसल नाम भी “रोज़ा” है।
औरतों को मासिक धर्म और प्रसव के समय में रोज़ा ना रखने की छूट है। शेष, नमाज़, ज़कात इत्यादि तो फर्ज़ हैं ही जो रमज़ान के महीने में संपुर्ण होने की कोशिशें की जाती हैं। सोचिएगा कि 30 दिन ऐसा जीवन व्यतीत करके कोई कितना नेक और पवित्र हो सकता है कि 31वें दिन वह इसी स्वभाव में रहना चाहेगा , कुछ लोगों को बिगड़ते बिगड़ते कुछ दिन तो लगेंगे ही और कुछ लोग यही जीवन अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके आगे भी जीते रहेंगे और कुछ लोग यदि डगमगाए तो 11 महीने बाद फिर से रमज़ान उनको सुधारने के लिए आ जाएगा।
कुल मिलाकर एक वाक्य में रमजान किसी व्यक्ति के संस्कार और व्यवहार को उच्च स्तर पर ले जाने का एक महीना है, कुरान की यह वह व्यवस्था है जो बड़े से बड़े धनाढ्य और शहंशाह तथा बादशाहों को गरीब भूखे प्यासे की गरीबी उनकी भूख उनकी प्यास साल के हर महीने में महसूस करने को मजबूर करती है। सोचो कि 45-50° के तापमान की भूख प्यास हो, बरसात हो या माईनस ज़ीरो डिग्री में गरीबों का भूखा प्यासा रहना, क्या बीतती है उनपर यह खुद महसूस करो, क्युँकि खुद महसूस करोगे तो उनके दर्द और तकलीफ का एहसास होगा, तो उनपर ज़कात निकाल कर खर्च करोगो।
छद्म नास्तिकों को यह समझ में नहीं आएगा…। 🙂 😛

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