सहारनपुर में फिर हुआ दोबारा कत्लेआम, उपद्रव करने वालों को किनका संरक्षण प्राप्त है?
वीपी सिंह से चलते हुए पिछले पच्चीस सालों के दौरान सवर्णों के बीच राजपूतों की छवि ऐसी बनी थी कि उसे कमजोर तबकों के बीच एक भरोसा हासिल हो रहा था…! वरना इतिहास से लेकर अब तक क्षत्रिय और उसके बाद राजपूत केवल ब्राह्मण-व्यवस्था की सत्ता कायम रखने के औजार और हथियार के रूप में ड्यूटी निभाते रहे हैं!
अब राजपूतों की ओर से कुछ चेहरे दलितों और कमजोर जातियों के बीच स्वीकार्य हो रहे थे और इस समूची जाति की छवि बेहद मामूली-सी सुधरने लगी थी तो राजपूतों से सहारनपुर में दलितों का कत्लेआम करवा दिया…! कौन है वह करवाने वाला…! सहारनपुर ने एक बार फिर सबसे हाशिये पर मर-जी रही दलित आबादी के भीतर राजपूतों के खिलाफ एक शक पैदा किया है… भविष्य के संघर्ष के निशाने शायद वही हों…!
राजपूतों को यह समझना होगा कि इतिहास से लेकर अब तक वे किसके हाथों की कठपुतलियां बने उसकी सत्ता कायम रखने में केवल तलवार की भूमिका निभाते रहे! उन्हें बुनियादी रूप से इंसान भी नहीं बनने देने वाली वह कौन-सी व्यवस्था है, जिसके खिलाफ उसके मुंह नहीं खुलते!
