हिन्दू जब चाहेंगे बीस करोड़ मुसलमानों को भगा देंगे,,,हमें आपकी ताक़त का अंदाज़ा है श्रीमान!!
उत्तर प्रदेश के एक भाजपा नेता ने घोषणा की है कि सौ करोड़ हिन्दू जब चाहेंगे बीस करोड़ मुसलमानों को भगा देंगे। बातें तो उन्होंने और भी कई की हैं लेकिन यह कहकर उन्होंने उन सब का महत्व घटा दिया। कुल मिलाकर, जब मुसलमान ही नहीं होंगे तो क्या बाबरी मस्जिद और क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ। हम यह बिल्कुल नहीं कहते कि आप ऐसा नहीं कर सकेंगे।
हमें आपकी ताक़त मालूम है और अपनी औक़ात का भी पता है। और अब तो कोई अंधा भी बता सकता है कि देश में मुसलमानों के लिए म्यांमार या बोस्निया जैसे हालात बनते जा रहे हैं। हम तो अब इस स्थिति में भी नहीं रहे कि किसी प्रकार की ऊंच नीच बताने का साहस कर सकें। आप जो चाहते हैं कर गुज़रते हैं और आगे भी जो चाहेंगे कर गुज़रेंगे।
आपसे हमें कोई शिकायत आखि़र हो भी कैसे सकती है। हम तो दिन रात कांग्रेस और अपने अन्य धर्मनिरपेक्ष मित्रों की माला जपते आए इस उम्मीद के साथ कि आप मारेंगे तो वह बचाएंगे लेकिन उन्होंने भी आपके साथ हाथ मिला लिया। यह बात हम केवल अनुमान के आधार पर नहीं कह रहे हैं।
देश भर में हमारे दोस्त दलों के करोड़ों सदस्य हैं और वे सभी पक्के सेकुलर भी हैं मगर आज जब हमारी जान पर बन आई है तो कोई नहीं जानता कि वे कहाँ हैं। इन अत्याचारियों ने हमें जी भर के लूटा, हमारे वोटों से सरकार बनाई, अपना घर भरा, हमारे आगे भीख के कुछ टुकड़े डाले और अपने दलालों को नई दिल्ली में बंगले देकर हमसे हमेशा के लिए काट दिया। अब हम हैं और हमारी यह बे आबरूई।
पूरे देश में मुसलमान तमाशा बनकर रह गए हैं। कुत्ते बिल्लियों भी सस्ती होकर रह गई है उनकी जान। वह माल-व-दौलत होते हुए भी दो कौड़ी के हैं। उनकी इज़्ज़त सरेआम लूटी जा रही है, उन्हें खुलेआम हिन्दू बनने के लिए कहा जा रहा है, धर्म रीति रिवाज और क़ानून सब कुछ आपके ठेंगे पर है।
और क्यों न हो? आपकी नज़र दुनिया पर है। मुसलमान बोस्निया में गाजर मूली की तरह काट डाले गए, कुछ भी तो नहीं हुआ। म्यांमार में जलाए गए, मारे गए, सागर में डूबोए गए मगर क्या कहीं से कोई आवाज़ उठी? यह तो बहुत छोटे देश हैं। भारत एक विशाल देश है। यहाँ मुसलमानों के साथ कुछ भी कर लो, कोई है जो आपका हाथ पकड़ने आएगा।
आप कहते हैं पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना। हमें तो पता नहीं कि सारे मुसलमान पाकिस्तान की मांग करते तो इतना छोटा पाकिस्तान कैसे बनता। हमने तो अपने बुजु़र्गों से यही सुना है कि सारे मुसलमान जिन्ना के साथ नहीं थे और जो जिन्ना के साथ नहीं थे वे भारत में ही रुक गए।
अब अगर आपको लगता है कि मुसलमान इस देश पर बोझ हैं तो इस पर खुलकर बात करें। मुसलमानों की स्थिति तो साफ़ है कि वह भारत को अपना घर समझते हैं। इसलिए पाकिस्तान और बांग्लादेश से बात किए बिना आपके दिल की फांस निकलने वाली नहीं है। यदि आपका दावा सही है तो इन देशों से भी बात करें और पच्चीस करोड़ मुसलमानों को उनकी झोली में डाल दें।
आखि़र जब बंटवारे के बात चली होगी तो सारी शर्तें लिखी भी होंगी। वह लिखत पाकिस्तान को दिखाएं, बांग्लादेश को भी दिखाएं ताकि बातचीत के माध्यम से कहीं तो पहुंचा जा सके।
हम एक बात फिर स्पष्ट कर दें कि हमारा उद्देश्य आपको नसीहत करना नहीं है। अपना भला बुरा आप अच्छी तरह समझते होंगे। आपने यूं ही थोड़ी कह दिया होगा कि हिंदू जब चाहें मुसलमानों को भगा सकते हैं। कहीं न कहीं पार्टी में ऐसा कुछ ज़रूर चल रहा है। संघ का तो ख़ैर एजेंडा ही यही है।
लेकिन इतने बड़े मुद्दे को हल करने के लिए ज़बरदस्त तैयारी चाहिए। तैयारी आपने भी की होगी पर थोड़ा प्रैक्टिकल होने की ज़रूरत है। हज़ार पांच सौ घरों वाली झुग्गी बस्ती में बुलडोज़र चलाने से पहले भी योजना बनाई जाती है। ऐसा नहीं है कि सरकार उन्हें उजाड़ने की ताक़त नहीं रखती।
फिर भी कुछ न कुछ व्यवस्था तो करनी पड़ती है। यहां पच्चीस करोड़ की आबादी को हज़ार दो हज़ार किलोमीटर दूर ले जाकर बसाना है।
आप फेंकना भी चाहें तो इतनी बड़ी आबादी को फेंक नहीं सकते। आखि़र दो ढाई महीने तक उधम मचाने के बाद भी आप गुजरात को मुसलमानों से ख़ाली नहीं करा सके। ख़ुद ही सोच लें कि पूरा भारत मुसलमानों के क़ब्जे़ से मुक्त कराने के लिए कितना लंबा ऑपरेशन करना होगा, कितने साल तक कारोबार बंद रहेंगे, देश को कितना वित्तीय नुक़सान उठाना पड़ेगा और इतना नुक़सान उठाने के बाद भी आपको क्या मिलेगा।
हम अपनी जान बचाने के लिए ऐसा नहीं कह रहे हैं। हम सचमुच चाहते हैं कि आप के मन में ऐसा कुछ चल रहा है तो उस पर खुलकर बात होनी चाहिए। हर दिन की किच-किच से अच्छा है कि हम एक ही बार निपट लें। देश में रहने की शर्त बता दें अगर इतनी रियाअत देने को तैयार हों।
अन्यथा इस समस्या के जितने भी शरीक हों, सभी को संवाद की मेज़ पर बिठाकर दो टूक बात करें। कांग्रेसियों से तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वह दिल का हाल ज़बान पर लाएंगे लेकिन आप मुंह फट क़िस्म के लोग हैं, इसलिए सब कुछ साफ़-साफ़ कहना जानते हैं बस थोड़ा सुनने की आदत ज़रूर डाल लें।
बात कहीं भी हो सकती है। वैसे भी इस संबंध में हमारी ओर से कोई शर्त क्या मायने रखती है? हम तो बस इतना चाहते हैं कि बंटवारे का एजेंडा यदि अधूरा रह गया है तो उसे अब पूरा कर लेना चाहिए ताकि हिंदू और मुसलमान दोनों चैन से रह सकें।
आप सोचते होंगे कि मुसलमानों की तरफ़ से कौन बातचीत के लिए आगे आएगा। आप एक बार ज़िक्र छेड़ें तो। किसी को तो तौफ़ीक़ होगी। ख़ून ख़राबा किसे अच्छा लगता है? हम वैसे भी पूरी आबादी का शायद पांचवा हिस्सा हैं और हैं भी पूरी तरह निहत्थे। ऐसे में कौन नहीं चाहेगा कि बातचीत से मामले को निपटाया जाए। अपनी ताक़त तो हमने देख ही ली है।
आपने अयोध्या में राम मंदिर बना लिया। आप शरीयत की धज्जियां बिखेर चुके। आपने उर्दू सीमा पार भेज दी। आपने हैदराबाद भी हड़प लिया और कश्मीर भी। आप जब चाहते हैं, जहां चाहते हैं, जिसे चाहते हैं अपना शिकार बना लेते हैं। अब और क्या देखना है? आप जो चाहेंगे कर गुज़रेंगे इतना तो हम जान ही चुके हैं। फिर भी अगर इस एजेंडे को बातचीत से हल कर लिया जाता तो हमें लगता है कि हम दोनों के लिए बहुत अच्छा होता।
