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अगस्त महीने में मासूमों की लाशों का अंबार लग गया, लेकिन अब कब आएगी गोदी-मीडिया?






गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में अगस्त माह में बीते 29 दिनों में 386 बच्चों की प्रशासनिक लापरवाही के कारण मौत हो गई। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे खुद अपना भविष्य नहीं देख पाए। ऐसे में योगी आदित्यनाथ का बयान आता है कि कहीं लोग अपने बच्चों को पालने के लिए सरकार के भरोसे न छोड़ दें। ऐसे में तो हम सिर्फ इतना ही कह पायेंगे कि भला कोई मां-बाप अपने बच्चों को पालने के लिए किसी योगी के भरोसे कैसे छोड़ सकता है।

गोरखपुर पिछले कई सालों से इंसेफेलाइटिस की मार झेल रहा है। जिस पर प्रशासन की लापरवाही लोगों की समस्या को बढ़ाने में लगी हुई है। मामला तब सामने आया जब ऑक्सीजन की कमी के कारण गोरखपुर में दो दिन में 30 से ज्यादा बच्चों को अपनी जान गवां देनी पड़ी। इसके बाद शुरू हुआ खेल सियासी लीपापोती का। प्रशासन की नाकामी को छिपाने के इस खेल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगुवा बनकर सामने आए।

योगी ने कहा कि वह बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी नहीं बल्कि गंदगी के कारण हुई। जबकि बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी ने लोगों ने खुद अपने मासूमों को मरते अपनी आंखों के सामने देखा था। इसके बाद मु्ख्यमंत्री सिर्फ और सिर्फ लीपापोती करते नजर आए।





सियासी लीपापोती का असर यह हुआ कि गोरखपुर में फिर एक बार मासूमों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया। अगस्त खत्म होते-होते फिर से तीन दिन में करीब 70 बच्चों की जान अस्पताल के पस्त प्रशासन ने ले ली। इस सब पर मीडिया की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

बलात्कार के आरोप में गुरमीत की सजा पर पूरे साजो सामान के साथ हरियाणा से रिपोर्टिंग करने वाली मीडिया के लिए गोरखपुर में 29 दिन में 386 बच्चों की जान की कीमत कुछ भी नहीं है। जबकि साक्ष्य मौजूद हैं कि बच्चों की मौत केवल और केवल प्रशासन की लापरवाही की वजह से गई हैं। मुंबई की बाढ़ पर पानी-पानी करती मीडिया के लिए गोरखपुर के उन परिवारों के आंसू नहीं दिखाई दे रहे हैं, जिनके घर अपने ही आंसुओं से बह गए हैं।

क्या गोरखपुर में बच्चों की मौत पर मीडिया को निर्भया केस की तरह कवरेज नहीं करनी चाहिए थी। ताकि देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले भ्रष्ट सरकारी प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया जाता। शीना बोरा कांड में दिन रात एक करने वाला मीडिया गोरखपुर में बच्चों की मौत में चुप बैठे रहना सिद्धांतहीन मीडिया के चेहरे को सामने लाता है।

गोरखपुर की मौत पर मीडिया की बेरुखी से लगता है कि मीडिया को मासूमों की मौत से ज्यादा अपने विज्ञापनों और टीआरपी से है। विज्ञापनों की गोद में बैठी गोदी मीडिया न जाने अपनी आंखों की पट्टी खोल गोरखपुर पहुंचेगी और बच्चों की इन प्रशासनिक मौतों की कवरेज कब करेगा। बच्चों की मौत के पीछे अपनी रोटियां सेक रहे लोगों को कठघरे में कब खड़ीं करेगी।
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