यूपी की योगी सरकार सिर्फ मुसलमानों के विरुद्ध ले रही फैसले, तीन तलाक, मदरसे, अब बक़रीद
इलाहाबाद: इस भारत देश की अदालतों में मुस्लिमो के लिए न्याय नहीं है, यह बात आप को 1 नहीं पुरे 100 बार सिद्ध हो चुका है, सिर्फ़ अदालतें ही नहीं, व्यवस्था में भी मुसलमानों के लिए न्याय नहीं है, केवल उत्तर प्रदेश की बात करूं तो 4 महीने पहले बन चुन कर आई योगी सरकार केवल और केवल मुसलमानों के विरुद्ध फैसले ले रही है और उसमें कम से कम 5 फैसले तो केवल मदरसों के विरुद्ध ही ले चुकी है।
देश के मुसलमानों की आस उच्चतम न्यायालय से भी उम्मीदें खत्म होती जा रही हैं। जब भी किसी मामले में एक पक्ष मुसलमान या इस्लाम होता है न्यायालय पक्षपाती होकर संविधान की बजाए मनु स्मृति के आधार पर फैसले देनें लगती हैं।यह अघोषित रूप से देश के मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक समझ लिए जाने का प्रतीक है और भारत की पूरी व्यवस्था द्वारा मुसलमानों के प्रति किया जा रहा दोयम दर्जे का व्यवहार है।
उच्चतम न्यायालय की नज़र में यह सब इन लोगों के मूल अधिकारों में आता है क्युंकि यहां किसी भी उदाहरण में मुसलमान एक पक्ष आपको नहीं मिलेगा, परन्तु जैसे ही अदालत के सामने एक पक्ष मुसलमान होगा उसके अंदर मनु महाराज प्रवेश कर जाते हैं और संविधान की मोटी-मोटी आइसीपी और सीआरसीपी की कानूनी किताबों की जगह मनुस्मृति ले लेती है।
फिर उस मुसलमान के मौलिक अधिकार की पुल्ली बनाकर अदालत उसी में घुसेड़ देती है,उच्च न्यायालय मैरेज ऐक्ट में रजिस्टर्ड दो बालिग लोगों के विवाह को अवैध घोषित कर देती है और उच्चतम न्यायालय उसके पीछे एनआईए छोड़ देती है।
24 वर्ष की एक लड़की अपनी मर्ज़ी से विवाह करे तो उसकी जाँच एनआईए करती है और गोरखपुर में एक महीने में 300 बच्चों के मरने की जाँच जिलाधिकारी करता है। यह है फैसला क्यों की वो मुसलमान है।
दर असल इस देश में मुसलमानों का ना तो मौलिक अधिकार है, ना धार्मिक अधिकार और ना संवैधानिक अधिकार।
तीन तलाक पर महिला के अधिकार के लिए उछल उछल और कूद कूद कर प्रतिदिन सुनवाई करने वाली और फैसला सुनाने वाली सर्वोच्च न्यायालय को 24 वर्ष की एक लड़की के मौलिक और संवैधानिक अधिकार नहीं दिखते। इसी को दोगलापन कहा गया है, जो एक पक्ष मुसलमान दिखते ही पैदा होने लगता है।
