‘अब हमारा हिन्दुस्तान, भागो मुल्ला पाकिस्तान’ – महेश कुमार
सुबह के वक्त राजीव पार्क में जब शाखा लगती है तो वहां की आबो-हवा में ही सांप्रदायिक तनाव की बू आने लगती है। इस पार्क के इर्द-गिर्द मुस्लिम आबादी बहुमत में है और जब वे लोग शाखा में लगाए जाने वाले साम्प्रदायिक और मुस्लिम विरोधी नारों को सुनते हैं तो एक अजीब सी बेचैनी पैदा होने लगती है।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की टीम रविवार को जब स्थिति का जायजा लेने के लिए इलाके का दौरा किया तो पाया कि शाखा किसी शारीरिक कसरत या सांस्कृतिक कार्यकर्म के लिए नहीं बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने के लिए लगाई जा रही थी। उनकी गतिविधियों से यह स्पष्ट था कि उनका एकमात्र निशाना इलाके में रह रहे मुसलमान समुदाय के लोग हैं।
हमने स्थिति का जायजा लेने के लिए वहां कुछ महिलाओं से बात की जिनके घर पार्क के सामने हैं। मीना बेगम जिनकी उम्र करीब 45 वर्ष है, कहती हैं कि यह पार्क हमेशा से ही आम पहलकदमी और घूमने फिरने का स्थान रहा है। यहाँ सुबह और शाम को अक्सर महिलायें और बच्चे घूमने व खेलने के लिए एकत्रित होते थे। इनमे सभी धर्मों के लोग शामिल होते थे।
मीना बेगम ने यह भी बताया कि साल में एक बार ईद की नामाज़ा जरूर अदा की जाती थी वह भी इसलिए क्योंकि यहाँ की बहुमत आबादी मुस्लिम है और ईद की नमाज़ यहाँ अदा करना इलाके की एक रवायत बन गयी थी। उन्होंने यह भी बताया कि इसी पार्क में दशहरा का भी आयोजन होता था. मीना आगे कहती हैं कि जब से संघ ने यहाँ शाखा खोली है और रामलीला खेलनी शुरू की है तब से इलाके में साम्प्रदायिक तनाव का खौफ बनने लगा है।
वे कहती हैं कि शाखा की कार्यवाही और उनके मुस्लिम विरोधी नारों से कईं बार तो माहौल इतना खौफज़दा हो जाता है कि लगता है कि अब स्थिति काबू से बाहर हो जायेगी। उन्हें लगता है कि इस तनाव भरे माहौल में अगर किसी शरारती तत्व ने कुछ कर दिया तो पूरा मौहल्ला साम्प्रदायिकता की चपेट में आ जाएगा और त्रिलोकपुरी जैसे हालात बन जायेंगे। वे यह भी कहती हैं हैं कि अगर उन्हें नमाज़ से परेशानी है तो हम नमाज अदा नहीं करेंगे लेकिन फिर इस पार्क को आम खेलने और टहलने के लिए सुरक्षित किया जाए ताकि साम्प्रदायिक उन्माद पैदा होने की कोई भी गुंजाईश बाकी न रहे।
उन्होंने यह भी बताया कि संघ ने गैर-कानूनी ढंग से पार्क में एक चबूतरा बना लिया है और उस चबूतरे पर वे शाखा करते हैं। इस गैर-कानूनी कार्यवाही पर प्रशासन ने कोई भी कार्यवाही नहीं की है। वे चेतावनी देती हैं कि अगर प्रशासन ने समय रहते कोई कार्यवाही नहीं की तो हालात काबू से बाहर जा सकते हैं और इसका शिकार सबसे ज्यादा बच्चे और महिलायें बनेंगी।
श्रीराम कॉलोनी में मुस्लिम आबादी 85 से 90 प्रतिशत और हिन्दू व अन्य समुदायों से जुड़े लोगों की आबादी 10 से 15 प्रतिशत है। यह दिल्ली की अन्य बस्तियों की तरह एक अनाध्रिकृत कोलोनी है जिसमें गरीब-मजदूर तबका जीवन बसर करता है। यह बस्ती उत्तर प्रदेश के लोनी से सटी हुयी है। इसके आस-पास की कोलोनियाँ खजूरी, सोनिया विहार और गंगा विहार भी अनधिकृत हैं।
ये बस्तियां शासक पार्टियों के लिए बहुत बड़ा वोट-बैंक है और सभी शासक पार्टियां इन कोलोनियों को अधिकृत करवाने का नारा लगाती रही हैं। यहाँ आम जन-सुविधाओं में बुनियादी कमी है। गलियों में खडंजे नहीं हैं, पार्क कच्चे हैं, बारिश के दिनों में पानी भर जाता है। बेहतर स्कूलों का नितांत अभाव है। बावजूद इसके यहाँ के लोग बड़े मेल-मिलाप के साथ रहते हैं। आज तक इस क्षेत्र में कोई सांप्रदायिक घटना नहीं घटी है।
तरन्नुम, उम्र 29 वर्ष तो इस माहौल को देखकर कईं बार अवसाद (डीपरेशन) की शिकार हो चुकी हैं। इलाके के लोगो और जनवादी महिला समिति की कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझा कर उनकी हिम्मत को बढ़ाया है। तरन्नुम कहती है कि हालात बहुत खराब हैं। शाखा वाले हमारे घरों की तरफ मुहं करके पेशाब करते हैं। जोर-जोर से नारे लगाते हैं और जब शाखा छूटती है तो लाठियां पटकते हुए गलियों से निकलते हैं, इसके चलते कईं परिवारों ने खासकर लड़कियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है क्योंकि जब शाखा छूटती है तभी बच्चियों का स्कूल जाने का समय होता है। तरन्नुम कहती हैं कि यहाँ के निवासी प्यार-मोहब्बत से रहना चाहते हैं लेकिन बाहर से आकर संघ के लोग जब यहाँ शाखा लगाते हैं तो माहौल खराब होने लगता है और भय का वातावरण बन जाता है।
