गोरखपुर दंगा मामले में योगी की बढ़ी मुश्किलें, मुख्य अभियुक्त योगी आदित्यनाथ
इस संबंध में मुतवल्ली रशीद खान ने केस क्राइम नंबर 43 /2007 थाना कोतवाली गोरखपुर अंतर्गत धारा 147, 295, 297, 436, 506, 153 a, IPC में दर्ज कराया था,इसी मामले में योगी गिरफ्तार हुए थे और एक सप्ताह से अधिक समय तक जेल भी थे,इस मामले में इन्वेस्टीगेशन पूरा होने पर उपरोक्त सभी के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायलय में दाखिल किया गया और तत्कालीन मायावती सरकार ने 153 ए के तहत मुक़दमा चलाने की अनुमति भी 13 /10/2009 को दे दी और इसके बाद सक्षम न्यायालय ने संज्ञान आदेश 22/12/2009 को पारित कर दिए।
इसके बाद आरोप निर्धारण किया जाना था मगर 2014 तक ऐसा कोई आदेश कोर्ट ने पारित नहीं किया। 2014 में मनोज खेमका ने यह आपत्ति दर्ज कराई कि मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी का जो आदेश 13 /10/2009 है, वह अवैध है क्यों कि उसपर राज्यपाल द्वारा नियुक्त सचिव /अधिकारी जे बी सिन्हा के हस्ताक्षर नहीं है बल्कि अनुसचिव राम हेत के हस्ताक्षर हैं,जो अभियोजन स्वीकृति देने के आदेश पारित करने के लिए अधिकृत नहीं थे।
हाईकोर्ट इलाहबाद में अधिवक्ता फ़रमान अहमद नक़वी ने बहस की और यूपी सरकार की तरफ से एड्वोकेट जरनल श्री राघवेंद्र सिंह और उनके पैनल ने उन्होंने सवाल किया कि राजनितिक लोगो को बचाने के लिए अदालतों के साथ फ्रॉड किया जा रहा है और सरकारी रिकॉर्ड में रखे ओरिजनल रिकॉर्ड को छुपाया जा रहा है,और कोर्ट के सामने क्यों नहीं लाया जा रहा है।
अगर दलील के तौर पर ये मान लिया जाए कि राज्यपाल द्वारा अधिकृत अधिकारी जे बी सिन्हा ने दस्तखत नहीं किया तब क्या अनुसचिव रामहेत ने फर्जी आदेश पारित करके उसकी सुचना ज़िला पुलिस अधिकारियों को भेज दी अगर वास्तव में यही है तब क्या यह माना जायेगा कि इस मामले की अभियोजन स्वीकृति की फाइल अभी तक राज्य सरकार के गृह मंत्रालय में लंबित है,अगर ऐसी स्थिति होगी तब अभियोजन स्वीकृत कौन करेगा,अब देखना है आने वाले दिनों में योगी जी को राहत मिलती है या परेशानी।
