मदरसों में रोज गूंजता है ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’
मैंने पाँचवीं तक मदरसे में पढ़ा है और जिस मदरसे में हम पढ़ते थे उसमें बहुत कम संख्या में ही सही लेकिन हिन्दू बच्चे भी पढ़ते थे। जो लोग मदरसे की हरी रंग की दीवारों को भगवा करना चाहते हैं उन्हें ये भी नहीं पता कि मदरसा शब्द का मतलब विद्यालय होता है ना कि धार्मिक विद्यालय।
जितने भी मदरसों को मैं जानता हूँ वहाँ इस्लामिक शिक्षा तो होती है लेकिन साथ ही साथ सभी ज़रूरी सब्जेक्ट भी पढ़ाये जाते हैं। हमारे मदरसे में हिंदी,उर्दू, विज्ञान, गणित, अंग्रेज़ी, कला और अरबी की तालीम दी जाती थी।इसमें समझने की बात है कि हमारे मदरसे में आठवाँ पीरियड अरबी और क़ुरान का होता था और जहाँ तक मुझे याद है हिन्दू बच्चों को क़ुरान की शिक्षा नहीं दी जाती थी। उसके पहले वो जा सकते थे।
जिन लोगों ने मदरसों की दीवारों के अन्दर कभी नहीं झाँका है उन्हें मैं बता दूँ कि हर एक मदरसे में 15 अगस्त और 26 जनवरी के रोज़ भारी रौनक़ होती है।रोज़ की बात करूँ तो हमारे यहाँ दो प्रेयर्स होती थीं।।एक तो ‘लब पे आती है दु’आ बनके तमन्ना मेरी।।” और एक “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा”… इन दोनों प्रेयर्स का क्या मतलब है ये हम सभी जानते हैं।
नफ़रत फैलाने वाले अगर सुबह मदरसे के सामने से गुज़रते हों तो नन्हें बच्चों की तेज़ आवाज़ में ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ ज़रूर सुनाई देगा। हालाँकि ये लोग अपने मज़हब के हैं ही कहाँ, ये लोग अपने को हिन्दू कह लें, मुसलमान कह लें, ईसाई कह लें, या सिख…अगर ये किसी दूसरे से किसी भी बात को लेकर नफ़रत करते हैं तो फिर ये मज़हब के हैं हीं कहाँ… और मैंने सुना है कि आरएसएस के स्कूलों में कुछ वंदना सी होती है।।बहरहाल, उन्हें तो मैं स्कूल भी क्यूँ मानूँ… जिस स्कूल में बच्चे को किसी के बारे में नफ़रत का एक शब्द भी सिखाया जाए वो स्कूल हो ही नहीं सकता।
अब कुछ लोगों का ये सोचना है कि मदरसे में पढ़ने वाले बच्चे आगे करियर में कुछ नहीं कर पाते तो मैं बताता चलूँ कि जिस मदरसे में मैं पढ़ा हूँ वहाँ के अधिकतर बच्चे आज अच्छी जगह पर अच्छी नौकरी या बिज़नस कर रहे हैं और कुछ राजनीति में भी हैं। जिन भी लोगों ने हमार मदरसे से पढ़ाई की है और जिन्हें भी मैं जानता हूँ, वो सभी पढ़-लिख कर आज बेहतर ज़िन्दगी जी रहे हैं, पैसों के हिसाब से भी और वैचारिक तौर पर भी।
ज़ाहिर है ज़माने के हिसाब से मदरसों में जो सुधार होना चाहिए था वो नहीं हो सका है लेकिन यही बात तो सरकारी स्कूलों की भी है। बदलते दौर में एक साज़िश के तहत ऐसा हुआ है कि मदरसों को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। जब सरकार में बैठे लोग ऐसी बातें करते हैं तो आम लोगों के ज़हन में भी बात फँस जाती है। ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोगों का इस तरह ग़ैर-ज़िम्मेदार हो जाना देश के लिए घातक है।
अरग़वान रब्बही
Courtesy: bharatduniya.com
