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‘सुप्रीम कोर्ट’ के इस बयान के आधार पर अब ‘बाबरी मस्जिद’ के पुन: निर्माण को कोई नहीं रोक सकता :मोहम्मद जाहिद






सुप्रिम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि मामले की सुनवाई पर जो टिप्पणी की है अगर आखिर तक सुप्रिम कोर्ट उसी पर टिका रहा तो इस मामले में इंसाफ की उम्मीद आसानी से लगाई जा सकती है। सुप्रिम कोर्ट ने कहा है कि “वह राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले को पूरी तरह से भूमि विवाद मानकर सुनवाई करेगा” दरअसल बाबरी मस्जिद की ज़मीन के मालिकाना हक के इस मुकदमें में सदैव से दोनों पक्षों का दो अलग अलग स्टैंड रहा है।

कट्टर हिन्दुत्ववादी इसे “आस्था” का मामला बता कर अदालत और कार्यपालिका पर धार्मिक दबाव बनाते रहे हैं और यहां तक कहते रहे हैं कि आस्था का मामला अदालत तय नहीं कर सकती, इसी दबाव को बढ़ाने के लिए अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए पत्थर लाये जाते रहे हैं और अदालत को धमकाने और उसकी औकात दिखाने के लिए प्रतिदिन मंदिर निर्माण की तिथि की घोषणा की जाती रही है।

जबकि मुसलमानों का पक्ष सदैव से यह रहा है कि यह आस्था का नहीं ज़मीन के मालिकाना हक का मामला है। उच्चतम न्यायालय ने मुसलमानों के पक्ष को ही एक तरह से सही सिद्ध किया और इस मुकदमें से आस्था जैसे दबावों को नकार दिया जो मुसलमानों के पक्ष की जीत ही है।

उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी से “आस्था” , “बाबरी मस्जिद राम मंदिर तोड़ कर बनाई गयी” “बाबर ने राम मंदिर तोड़ा” इत्यादि इत्यादि जैसे झूठे गढ़े गये किस्से कहानी इस मुकदमें से बाहर हो चुके हैं। उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी से इन झूठे किस्से कहानियों का इस मुकदमें पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

न्याय की अदालतें जितनी बड़ी होती जाती हैं उन पर नज़रें और बढ़ती जाती हैं , सेशन या हाईकोर्ट के मुकदमों पर दुनिया की नज़र कम ही रहती है जबकि उच्चतम न्यायालय के मुकदमों के फैसलों का पोस्टमार्टम पूरी दुनिया में होता है। बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि मुकदमें पर पूरी दुनिया की नज़र है, इसके फैसले से उच्चतम न्यायालत की क्रेडिटेबिलीटी या तो और नीचे चली जाएगी या बहाल होकर बुलंद होगी।

इसी कारण यह मुकदमा उस उच्चतम न्यायालय की शाख से जुड़ा मुकदमा है जो चार वरिष्ठ जजों के पक्षपात के रहस्योद्घाटन से साख खो चुका है। दरअसल उच्चतम न्यायालय के पास इस टिप्पणी के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी नहीं , यह मुकदमा “ज़मीन के मालिकाना हक” का ही मुकदमा है ना कि यह तय करने का कि श्रीराम कहाँ पैदा हुए।

श्रीराम जी के “जन्मस्थल” के रूप में अयोध्या के रामजानकी महल में एक मंदिर है जिसमें पिछले 600 सालों से “रामलला” की पूजा होती है , इसके अतिरिक्त हरियाणा का कुरुक्षेत्र चुंकि कौशल्या का मायका था तो पहले संतान के मायके में जन्म लेने की परम्परा के कारण कुरुक्षेत्र में एक भव्य मंदिर बना है जहां राम जी के जन्म स्थान के रूप में पूजा की जाती है तो पाकिस्तान के “डेरा इस्माइल खान” में श्रीराम के जन्म लेने के दावे भी किए जाते रहे हैं परन्तु सबसे महत्वपुर्ण है युनेस्को द्वारा थाईलैंड की अयोध्या को भारत के ऐतराज के बाद प्रमाणित करना कि थाईलैंड की अयोध्या ही असली अयोध्या है थाईलैंड में श्रीराम के जन्मस्थान होने की पुष्टि करते हैं।

भगवाधारियो ने तो बिना राजा दशरथ और माता कौशल्या के मिलन के ही श्रीराम का जन्म चोरी से मात्र 70 साल पहले बाबरी मस्जिद में करा कर श्रीराम की मर्यादा को तार तार कर दिया। तो तय तो यह होना चाहिए कि श्रीराम दरअसल किस देश और किस शहर में पैदा हुए थे।

जब भी ज़मीन के मालिकाना हक के सबूत मांगे जाएंगे तो मुगल राज्य से लेकर ब्रिटिश राज्य , और फिर स्वतंत्र भारत के सभी सरकारी अभिलेखों में “बाबरी मस्जिद” ही दर्ज मिलेगी , उस ज़मीन के सारे दस्तावेज बाबरी मस्जिद के पास ही मिलेंगे।

सत्ता की ताकत से कोई रामजन्मभूमि चौकी थाना और सड़क भले बना ले परन्तु यह सब साजिशें केवल और केवल पिछले कुछ सालों की वैसे ही मिलेंगी जैसे किसी की ज़मीन कब्ज़ा करके कोई उस पर मकान बना ले , अपने नाम से बिजली, पानी और गैस का कनेक्शन लेले तथा नगर निगम से इसी आधार पर अपने नाम से असेसमेन्ट करा ले।

ज़मीन तो उसी की रहेगी जिसके पास उस ज़मीन के मालिकाना कागज़ात होंगे। महत्वपुर्ण सवाल यह है कि यदि दुनिया के लाज शर्म से बचने के लिए उच्चतम न्यायालय ने बाबरी मस्जिद के हक में फैसला दे दिया तब क्या होगा ? क्या राम लला वहाँ से हटेंगे और बाबरी मस्जिद फिर बनेगी ?

बहुसंख्यक और भगवा ताकतें ऐसा होने नहीं देंगे , 6 दिसम्बर की तरह लोकतंत्र , संसद , उच्चतम न्यायालय का सामूहिक बलात्कार कर दिया जाएगा। मेरा दिल कहता है कि शहीद बाबरी मस्जिद यदि मुकदमा जीत जाती है तो मुसलमानों को यह ज़मीन बिला शर्त “रामलला” को दान कर देनी चाहिए जिसका मंदिर निर्माण गैर भगवा गिरोह के हाथों हो।

क्योंकि यह मुकदमा ज़मीन से अधिक सच और झूठ , हक और अधिकार का था जिसमें बाबरी मस्जिद जीत गयी। बाबरी मस्जिद की शहादत ज़ाया नहीं होने देना चाहिए बल्कि देश के अमन चैन और आपसी मुहब्बत के लिए उसका इस्तेमाल करना चाहिए। मुसलमानों का यह फैसला इस देश की राजनीति को पलट देगा और ज़हरीले संघी तबाह हो जाएंगे। सोचिएगा कि पूरी दुनिया में इस “दान” का क्या असर होगा ? कभी कभी जीत कर हारने वाले को भी बाजीगर कहते हैं।




मोहम्मद जाहिद

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं ये उनके निजी विचार हैं)
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